यह तय है कि फेसबुक इस पोस्ट की रीच घटा देगा मगर क्या वह बात न कही जाए, जो दिल को आँसुओं से भिगो रही है .. जब कश्मीर में गिरती हुई बर्फ़ के बीच राहुल ने 3960 किलोमीटर की यात्रा पूरी करते हुए कहा, मैं वह फोन कॉल की परम्परा मिटा देना चाहता हूँ, जिसका दर्द मैंने 14 साल की उम्र में सहा और 21 साल की उम्र दोबारा उसकी तड़प को महसूस किया.. मैं यह सुनते हुए रोने लगा, मेरा गला भर आया क्योंकि बहुत छोटी उम्र में ऐसी ही फोन कॉल ने हमें स्कूल से बुलवाया था, जब मेरे आंगन में मेरे सबसे चेहते चचाजान के टुकड़ों में बंटी लाश आई थी.. यह हमने देखा था, एक और लाश हमारे एक पुरखे की भी थी, तब भी एक फोन आया था, बंटवारे में उनको भी शहीद किया गया था, हमने जब अपने चचाजान की खबर सुनी थी तो हम तब तड़प उठे थे, जब राहुल ने कहा तो वह दर्द उभर आया, लगा यही वह बात है जो हमारी देश की सेना के परिवारों, सीआरपीएफ के जवानो के घरों में खुटके की तरह रहती है ... जब राहुल ने कहा हम अपने देश से ऐसी हर कॉल को खत्म करना चाहते हैं जो भयंकर दुःख की सूचना लाए तो लगा यही तो हमारी बात है, यही तो देश चाहता है, यही तो भारत की सच्ची आत्मा ह...